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प्रेस विज्ञप्ति: महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट, 2026 पर वेस्टर्न रीजन बिशप्स काउंसिल के महाराष्ट्र के बिशपों का वक्तव्य

  • Writer: Archdiocese of Bombay
    Archdiocese of Bombay
  • 2 days ago
  • 4 min read

संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति

दिनांक: 19 मार्च, 2026


महाराष्ट्र धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2026 के खिलाफ कड़ा विरोध


हम, महाराष्ट्र राज्य के कैथोलिक धर्माध्यक्ष (बिशप), हाल ही में महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा पारित तथाकथित 'महाराष्ट्र धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2026' के प्रति अपनी गहरी निराशा व्यक्त करते हैं और इसका कड़ा विरोध दर्ज कराते हैं। धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करने के बजाय, यह कानून अपने वर्तमान स्वरूप में उस अधिकार को ही खोखला करता है जिसकी रक्षा करने का यह दावा करता है- अर्थात, अपनी पसंद का धर्म चुनने और मानने की स्वतंत्रता, जिसकी गारंटी भारत के संविधान के अनुच्छेद 19, 21 और 25 के तहत दी गई है।


इस अधिनियम के प्रावधान कैथोलिक चर्च की वैध धार्मिक प्रथाओं, विशेष रूप से इसके 'वयस्कों के लिए ईसाई दीक्षा संस्कार' (Rite of Christian Initiation of Adults - RCIA) कार्यक्रम में सीधे और अनुचित हस्तक्षेप के समान हैं।


हम उन सभी को धन्यवाद देते हैं जिन्होंने इस विधेयक का विरोध किया है। हालांकि, यह अत्यंत निराशाजनक है कि सत्ताधारी दल और कुछ अन्य लोगों ने सबसे अधिक प्रभावित होने वाले समुदायों के साथ पर्याप्त विचार-विमर्श किए बिना ही इस विधेयक को पारित कर दिया। श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार सहित पिछली सभी सरकारों ने धार्मिक समुदायों को प्रभावित करने वाले कानून बनाने से पहले हितधारकों (Stakeholders) के साथ संवाद करने की लोकतांत्रिक परंपरा को कायम रखा था। वर्तमान मामले में इस तरह के परामर्श दृष्टिकोण का स्पष्ट रूप से अभाव है।


अधिनियम के अध्याय III, धारा 6 में यह अनिवार्य किया गया है कि धर्मातरण का इरादा रखने वाले किसी भी व्यक्ति को साठ दिन पहले 'सक्षम प्राधिकारी' (Competent Authority) को नोटिस देना होगा।


यह अधिकारियोंको यह अधिकार भी देता है कि यदि आपत्तियां उठाई जाती हैं या स्वतः संज्ञान (suo moto) लिया जाता है, तो वे प्रस्तावित धर्मांतरण के "इरादे, उद्देश्य या कारण" की पुलिस जांच शुरू कर सकते हैं। यह प्रावधान व्यक्ति की अंतरात्मा और आस्था के नितांत निजी दायरे में गहरी घुसपैठ है, जो जांच, संदेह और उत्पीड़न के दरवाजे खोलता है। विधेयक के अधिकांश प्रावधानों की तरह यह धारा भी स्पष्ट रूप से मनमानी है और यह व्यक्ति के निजता के अधिकार का घोर उल्लंघन है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने 'न्यायमूर्ति के. एस. पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ' ऐतिहासिक फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित माना है।


कैथोलिक चर्च ने हमेशा जबरन धर्मांतरण का कड़ा विरोध किया है। चर्च का अपना 'कैनन लॉ (Canon 865 §1) स्पष्ट रूप से यह अनिवार्य करता है कि बपतिस्मा (Baptism) चाहने वाले किसी भी वयस्क को यह पूरी तरह से स्वेच्छा से और उचित शिक्षा ग्रहण करने के बाद ही करना चाहिए। RCIA प्रक्रिया, जो आमतौर पर कई महीनों तक चलती है, विशेष रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है कि व्यक्ति अपनी आस्था के संबंध में पूरी जानकारी के साथ एक स्वतंत्र निर्णय लें।


हालांकि, वर्तमान कानून के तहत, इस तरह के सावधानीपूर्वक और स्वतंत्र रूप से चुने गए धर्मांतरण को भी आसानी से चुनौती दी जा सकती है। यदि परिवार के सदस्य- जो स्वाभाविक रूप से ऐसे निर्णय का विरोध कर सकते हैं-आपत्तियां उठाते हैं, तो पादरियों और इस प्रक्रिया में शामिल अन्य लोगों पर विधेयक की धारा 2 (p) केतहत 'जबरदस्ती' या 'ब्रेनवॉशिंग' (मानसिक हेरफेर) का आरोप लगने का जोखिम है। ऐसी परिस्थितियों में, कोई भी गलत काम न होने के बावजूद, उन्हें सात साल तक की कैद और भारी जुर्माने सहित कठोर और असंगत दंड के खतरे का सामना करना पड़ेगा।

यह प्रभावी रूप से एक वैध धार्मिक गतिविधि को अपराध की श्रेणी में डालता हैऔर व्यक्ति एवं धार्मिक संस्थान दोनों पर अनुचित बोझ डालता है। आरोपी पर ही अपनी बेगुनाही साबित करने का बोझ (Burden of proof) डालना, झूठे आरोप लगाने वालों पर कड़ी सजा का अभाव, और अधिनियम की व्यापक व अस्पष्ट भाषा इसके संभावित दुरुपयोग के बारे में गंभीर चिंताएं पैदा करती है, जैसा कि अन्य राज्यों में भी देखा गया है। यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 21 दोनों का स्पष्ट उल्लंघन है।


अधिनियम को बारीकी से पढ़ने पर इसमें तटस्थता (neutrality) की चिंताजनक कमी दिखाई देती है। सामाजिक स‌द्भाव को बढ़ावा देने के बजाय, यह संदेह, विभाजन और अन्याय को जन्म देने का जोखिम पैदा करता है। यह कानून अल्पसंख्यक समुदायों को असंगत रूप से (disproportionately) प्रभावित करता प्रतीत होता है, जो इसकी मंशा और इसके लागू किए जाने के तरीके पर गंभीर सवाल खड़े करता है।


कैथोलिक चर्च हमेशा देश की प्रगति, एकता और अखंडता के समर्थन में खड़ा रहा है। इसने एक न्यायपूर्ण औरसमावेशी समाज के निर्माण में सरकारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है। हालांकि, जब कोई कानून संवैधानिक सिद्धांतों से भटकता है और पक्षपातपूर्ण या दमनकारी चरित्र अपनाता है, तो असहमति की सैद्धांतिक आवाज उठाना आवश्यक हो जाता है।


इसलिए, हम इस अधिनियम के वर्तमान स्वरूप का कड़ा विरोध करते हैं और इसे तत्काल वापस लेने या इसमें व्यापक संशोधन करने की मांग करते हैं। धार्मिक स्वतंत्रता राज्य द्वारा दी जाने वाली कोई रियायत नहीं है, यह एक मौलिक अधिकार है जिसका सम्मान, रक्षा और पालन करने के लिए राज्य संवैधानिक रूप से बाध्य है।

न्याय, संवैधानिक अखंडता और मौलिक अधिकारों की रक्षा के हित में जारी।


हस्ताक्षरकर्ता :

1. आर्चबिशप एलायस गॉन्सल्वेस- नागपुर आर्चडायोसिस एवं अध्यक्ष, WRBC (वेस्टर्न रीजन कैथोलिक बिशप्स काउंसिल)

2. आर्चबिशप जॉन रोड्रिग्स बॉम्बे आर्चडायोसिस

3. बिशप थॉमस डी' सूजा सचिव, WRBC वसई डायोसिस

4. बिशप सेबस्टियन कल्याण आर्चेपार्की

5. बिशप एफ्रेम नरीकुलम - चांदा एपार्की

6. बिशप लांसी पिंटो औरंगाबाद डायोसिस

7. बिशप मेलकॉम सिक्वेरा अमरावती डायसिस

8. बिशप एग्नेलो पिन्हेरो - सिंधुदुर्ग डायसिस

9. बिशप मैथ्यूज मार पोचोमियो - खड़की एपार्की

10. बिशप साइमन अल्मेडा - पुणे डायसिस

11. बिशप सावियो फर्नांडीस, बिशप स्टीवन फर्नांडीस, बिशप एल्विन डिसिल्वा सहायक बिशप, बॉम्बे आर्चडायोसिस



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